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शिर्डी के साँई बाबा जी के दर्शनों का सीधा प्रसारण... अधिक जानने के लियें पूरा पेज अवश्य देखें

शिर्डी से सीधा प्रसारण ,... "श्री साँई बाबा संस्थान, शिर्डी " ... के सौजन्य से... सीधे प्रसारण का समय ... प्रात: काल 4:00 बजे से रात्री 11:15 बजे तक ... सीधे प्रसारण का इस ब्लॉग पर प्रसारण केवल उन्ही साँई भक्तो को ध्यान में रख कर किया जा रहा है जो किसी कारणवश बाबा जी के दर्शन नहीं कर पाते है और वह भक्त उससे अछूता भी नहीं रहना चाहते,... हम इसे अपने ब्लॉग पर किसी व्यव्सायिक मकसद से प्रदर्शित नहीं कर रहे है। ...ॐ साँई राम जी...

Monday 28 July 2014

श्री साईं लीलाएं - डॉक्टर द्वारा साईं बाबा की पूजा

ॐ सांई राम




कल हमने पढ़ा था.. बाबा का विचित्र शयन


श्री साईं लीलाएं

डॉक्टर द्वारा साईं बाबा की पूजा

तात्या साहब नूलकर अपने डॉक्टर मित्र के साथ साईं बाबा के दर्शन करने के लिए शिरडी आये थे| मस्जिद में पहुंचकर उन्होंने बाबा के दर्शन कर उन्हें प्रणाम किया और कुछ देर तक वहीं पर बैठे रहे| कुछ देर बाद बाबा ने उन्हें दादा भट्ट केलकर के पास भेज दिया| तब वह केलकर के घर गये| केलकर ने उनका उत्तम ढंग से स्वागत किया और उनके रहने की भी व्यवस्था की|

कुछ देर बाद जब केलकर बाबा का पूजन करने के लिए चलने लगे तो डॉक्टर भी उनके साथ हो लिये| मस्जिद पहुंचकर पहले केलकर ने बाबा का पूजन किया, फिर डॉक्टर ने बाबा का पूजन किया और पूजन करते हुए पूजा की थाली में से चंदन लेकर बाबा के मस्तक पर त्रिपुंड आकार का तिलक लगा दिया| पर, बाबा ने कुछ भी नहीं कहा| बाबा ने बड़े शांत भाव से तिलक लगवा लिया| वहां उपस्थित भक्तों के मन कांप उठे, कि अब बाबा गुस्से में आयेंगे| क्योंकि बाबा किसी को गंध (चंदन आदि) लगाने नहीं देते थे| यदि किसी को लगाना होता तो वह बाबा के चरणों में लगाता था| केवल म्हालसापति ही बाबा के गले पर चंदन लगाते थे| मस्तक पर तिलक लगाने का साहस आज तक किसी ने नहीं किया था| डॉक्टर इस बात को नहीं जानते थे| पर, सबसे आश्चर्यजनक बात यह थी कि जब डॉक्टर ने बाबा के मस्तक पर त्रिपुंड आकार का तिलक लगाया तो बाबा कुछ भी नहीं बोले और न बाबा को गुस्सा ही आया, न बाबा ने मना ही किया|

उस समय तो केलकर जी चुप रहे, लेकिन जब शाम को बाबा के दर्शनार्थ मस्जिद आये तो उन्होंने बाबा से इसका कारण पूछा, तो बाबा बोले कि - "डॉक्टर पंडित ने मुझे जो तिलक लगाया था, वह मुझे श्री साईं बाबा समझकर नहीं लगाया, बल्कि अपने गुरु रघुनाथ महाराज घोपेश्वर कर (जो काका पुराणिक के नाम से प्रसिद्ध है) समझकर लगाया था| उस समय उन्हें मुझमें अपने गुरु के दर्शन हो रहे थे, जिन्हें वे चंदन का तिलक लगाया करते थे| उस समय उन्होंने मुझे अपने गुरु के रूप में तिलक लगाया था| उस समय उनके मन में वही श्रद्धा और प्रेमभाव था जो अपने गुरु के लिए था| उनके उस श्रद्धा और प्रेमभाव के आगे में विवश था| तब मैं भला उनको तिलक करने से कैसे रोक सकता था|"साईं बाबा अपने भक्तों की इच्छा या भावना के अनुसार ही पूजा करवाते थे| या फिर किसी को स्पष्ट मना भी कर देते थे| तब किसी में इतना साहस नहीं होता था कि वह बाबा से इसका कारण पूछ सके| क्योंकि बाबा अपने भक्त की भावना को पहले ही जान जाते थे|

कल चर्चा करेंगे..संकटमोचक साईं बाबा


ॐ सांई राम
===ॐ साईं श्री साईं जय जय साईं ===
बाबा के श्री चरणों में विनती है कि बाबा अपनी कृपा की वर्षा सदा सब पर बरसाते रहें ।

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